पेट साफ़ रखने के सबसे अच्छे तरीके - Pet Saaf Rakhne ke Sabse Achhe tarike.

पेट साफ़ रखने के सबसे अच्छे तरीके 

Best Ways to Keep Your Stomach Clean.
कहा जाता है कि पेट से ही ज्यादातर बीमारियां ( Pet ki Bimariyan ) कई अन्य बीमारियों को भी आमंत्रित करती है। शुरुआत होती है। यानी अगर आपका पेट साफ़ है तो आप स्वस्थ है, नहीं तो कई तरह कि बीमारियां आपको घेरने के लिए तैयार खड़ी रहती है। ऐसे में जरूरी है कि अपने खान-पान और जीवनशैली को सुधारें और स्वस्थ रहें। कई शोधों में यह बात साबित हो चुकी है कि

हाल ही में एक दवा कंपनी की ओर से हुए एक सर्वे में यह बात सामने आई है कि ज्यादतर लोग सर्दी-खांसी के बाद पेट साफ़ न होने यानी कब्ज़ की समस्या से परेशान है। देश में 22 प्रतिशत वयस्क पेट की बीमारियों से जूझ रहें है , जिनमें से 13 फीसदी में कब्ज़ की समस्या गंभीर है। यह समस्या वयस्कों को ही नहीं बल्कि युवा और प्रौढ़ आबादी में भी लगातार बढ़ती जा रही है।

 कब्ज़ की प्रमुख वजह खान-पान में गड़बड़ी और खराब लाइफस्टाइल है। दरअसल हम क्या खा रहे है इसका सीधा असर हमारी पाचन क्रिया पर पड़ता है। अगर हम हेल्दी चीजें खाते है तो हमारी पाचन क्रिया भी ठीक रहती है, नहीं तो कब्ज़ जैसी समस्या हमारे सामने खड़ी हो जाती है। इसलिए इस आर्टिकल ( Pet saaf Rakhne ke sabse achhe tarike ) में हम इन सभी पहलुओं पर चर्चा करने वाले है :-


⇛ विषय सूची :-
  1. क्यों होती है कब्ज़ की समस्या - Kabaz ki samsya kyon hoti hai.
  2. कब्ज़ होने से ये होती है परेशानियां - kabaz hone se kya samsyaein hoti hai.
  3. यह भी है कब्ज़ के अहम कारण - kabaz ke kaaran kya hai.
    1. डायबिटीज
    2. डिप्रेशन
    3. विटामिन्स
    4. हाइपोथायरॉइडिज्म
    5. दवाइयां 
    6. अत्याधिक डेयरी प्रोडक्ट्स
    7. ऐसे करें कब्ज़ पर कंट्रोल - Kabaz ka Control kaise Karen.
    8. Conclusion. 
    9. अधिक नमक लेने से याद्दाश्त होती है कम
    10. छींक को रोकने से कान को पहुँचता है नुक्सान
    11. धूम्रपान की आदत भगा सकता है टमाटर
    12. सनशाइन विटामिन को ना करें मिस

    क्यों होती है कब्ज़ की समस्या 

    कब्ज़ की समस्या में बहुत कड़ा मल या मल त्यागने में कठिनाई जैसी समस्या आने लगती है। इसकी मुख्य वजह है अत्याधिक मात्रा में पानी नहीं पीना, फाइबर की पर्याप्त मात्रा न लेना, एक्टिव लाइफस्टाइल न होना इत्यादि। दरअसल भोजन में पानी या फाइबर की कमी होने से आँतों में भोजन धीरे-धीरे खिसकता है। और बड़ी आंत उसमें से पानी सोखती रहती है। जिससे मल धीरे-धीरे कड़ा हो जाता है और मल त्यागने में परेशानी आती है। इसके अलावा मल त्यागने की प्रक्रिया को रोके रहना यानी जब मल त्यागना हो तब शौचालय नहीं जाना भी कब्ज़ की समस्या को बढ़ाता है।  

     कब्ज़ होने से ये होती है परेशानियां :-

     पेट में ऐंठन होना, पेट फूलना या जी मिचलाना। 
     मल त्यागने में अत्याधिक जोर लगना। 
     हमेशा मल त्यागने जैसी स्तिथि महसूस करना लेकिन मल नहीं त्याग पाना। 
     पेट पूरी तरह से खाली न होने का अहसास होते रहना। 
     खाना नहीं खाने पर भी पेट भरा-भरा लगना।  


     यह भी है कब्ज़ के अहम कारण :-


     डायबिटीज :-
    डायबिटीज की वजह से नर्व्स डेमेज हो सकती है जो व्यक्ति की पाचन शक्ति को कमज़ोर करती है। इसके अलावा कई न्यूरोलॉजिकल स्तिथि जैसे पार्किंसंस भी कब्ज़ का कारण हो सकती है। 

    >⇨ डिप्रेशन :-
    डिप्रेशन की वजह से शरीर की सामान्य प्रक्रिया धीमी हो जाती है, जिसका असर पाचन क्रिया पर पड़ता है। इसी तरह ब्लड प्रेशर भी कब्ज़ होने की एक वजह है। लो ब्लड प्रेशर होने पर डाययुरेटिक्स की वजह से यूरिन त्याग करने की मात्रा बढ़ जाती है जो हमारे सिस्टम से पानी की मात्रा को बाहर कर देते है। पानी की कमी से कब्ज़ की समस्या खड़ी हो जाती है। 

     विटामिन्स :-
    सभी विटामिन से कब्ज़ की समस्या नहीं होती है लेकिन कुछ तत्व जैसे कैल्शियम और आयरन से यह समस्या होने की आशंका बनी रहती है। 

     हाइपोथायरॉइडिज्म :- 
    इसमें थायरॉइड ग्रथियाँ कम एक्टिव होती है। जिससे शरीर की मेटाबॉलिक प्रक्रिया धीमी होने लगती है। हालांकि यह समस्या प्रत्यके हाइपोथायरॉइडिज्म से जूझने वाले व्यक्ति में नहीं दिखाई देती है। 

     दवाइयां :-
    कुछ दर्द निवारक दवाइयां खासतौर पर नारकोटिक्स कब्ज़ का कारण होती है। स्टडीज में यह बात सामने आई है कि एस्प्रिन और आईबूप्रोफिन जैसी दवाइयों का ज्यादा इस्तेमाल करने वाले लोगों में कब्ज़ की आशंका ज्यादा होती है। कुछ एंटी-डिप्रेसेंट दवाइयां भी यह समस्या बढ़ाती है। इन दवाइयों के साथ पेट साफ़ करने वाली चीजों का सेवन भी करना चाहिए। 

     अत्याधिक डेयरी प्रोडक्ट्स :-
    चीज ( Cheese ) और अन्य हाई फैट फूड्स से पाचन क्रिया धीमी हो जाती है। ऐसे में ऐसी चीजों से परहेज रखना और अत्याधिक फाइबर का सेवन जरूरी हो जाता है।


    ऐसे करें कब्ज़ पर कंट्रोल :-


     पानी की मात्रा बढ़ाएं :-

    अत्याधिक मात्रा में पानी व अन्य तरल पदार्थों का सेवन करने से मल त्यागने में परेशानी नहीं आती है। दरअसल तरल पदार्थ की पर्याप्त मात्रा होने से मल कड़ा नहीं होता है। जिसे त्यागने में जोर नहीं लगाना पड़ता है। जूस, हर्बल टी, दूध आदि का सेवन करना चाहिए। 

     ज्यादा से ज्यादा फाइबर :-

    सेब, ब्रोकली, राजमा, गाजर, अंकुरित दालें व अनाज, अंगूर आदि जिनमें अत्याधिक मात्रा में फाइबर होता है, का सेवन करना चाहिए। इससे पेट तो साफ़ रहता ही है, साथ ही अत्याधिक फाइबर के सेवन से दिल की बिमारी, स्ट्रोक और टाइप-2 डायबिटीज जैसी बीमारियों की आशंका भी कम रहती है। 

     ज्यादा दवाइयों से बचें :-

    ऐसी दवाइयों का लगातार या अत्याधिक मात्रा में सेवन करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। दरअसल ऐसी दवाइयों के लगातार सेवन से हमारे शरीर को भी इनकी आदत पड़ जाती है। और ऐसी स्तिथि में बिना इनके सेवन से मल त्यागना मुश्किल होने लगता है। 

    एक्सरसाइज करें :-

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    कम से कम रोजाना की 15-20 मिनट की वॉक भी इसमें प्रभावी हो सकती है। स्विमिंग, जॉगिंग और योग भी अच्छे विकल्प है। कपालभाति, अग्निसार क्रिया, पवनमुक्तासन, धनुरासन, भुजंगासन जैसी योग क्रियाएं भी कब्ज़ की समस्या से निजात दिलाने में मदद करती है। 

     अल्कोहॉल से बचें :-

    अल्कोहॉल पाचन क्रिया को कमज़ोर करने के साथ ही डिहाइड्रेशन की समस्या को बढ़ाता है और ग्लूकोज मेटाबॉलिज़्म को कम करता है। इससे कब्ज़ की समस्या बढ़ती है। 

     आयुर्वेद से भी उपचार :-

    त्रिफला चूर्ण गर्म पानी या हल्के गर्म दूध के साथ लें। इसके अलावा ईसबगोल की भूसी और त्रिफला मिलाकर भी लिया जा सकता है। इसके अलावा रात को सोते समय दूध के साथ अलसी के बीज लेना भी लाभकारी होता है। इसी तरह पित्त युक्त शरीर वालों में कब्ज़ का मूल कारण शरीर में पित्त की अधिकता से इन्फ्लेमेशन होना। इसी तरह कफ युक्त शरीर वालों को अपने भोजन में फाइबर का सेवन करना चाहिए।


    ⇒ Note 
    22% लोग देश में पेट की शिकायत से जूझ रहें है इनमें से 13 फीसदी लोग कब्ज़ से पीड़ित है।

     Conclusion

    आज की जीवनशैली को देखा जाए तो हमारे शरीर की सभी बीमारियों को पेट ही निमंत्रण देता है। यानी कि ज्यादातर बीमारियां पेट से शुरू होती है। और धीरे-धीरे हमारे पूरे शरीर को क्षतिग्रस्त कर देती है। इसका मुख्य श्रेय दो ही चीजों को जाता है एक तो हमारा खान-पान और दूसरा बिगड़ी हुई लाइफस्टाइल। हमें क्या खाना चाहिए, क्या नहीं खाना चाहिए। 

     इस बात पर हम बिलकुल सोच विचार नहीं करते। दबा-दबा के खाएं जा रहे है बस। आजकल की युवा पीढ़ी जंक फ़ूड को अत्याधिक महत्व दे रही है। जो भी हम खाते है उसका डायरेक्ट असर हमारी पाचन क्रिया पर पड़ता है अगर हम जंक फ़ूड को  छोड़ कर हेल्दी फूड्स को अपनी जीवनशैली में Add करें तो हमारी पाचन क्रिया ठीक होगी। जब हमारी पाचन क्रिया ठीक रहेगी तो हम बीमारियों से बचे रहेंगें। नहीं तो फिर बीमारियां तो हमारे खान-पान की वजह से दरवाजे पे दस्तक देती ही रहेंगी।  


     Extra Tips :-

     अधिक नमक लेने से याद्दाश्त होती है कम :-

    खान-पान में नमक की मात्रा को अधिक शामिल करने से भी याद्दाश्त घट सकती है। नेचर न्यूरोसाइंस में प्रकाशित एक शोध के अनुसार डाइट में अधिक नमक शामिल करने से मस्तिष्क के कॉर्टेक्स वाले हिस्से में रक्तसंचार काफी कम हो जाता है। चूँकि दिमाग का यह हिस्सा सिखने और चीजों को याद करने में अहम रोल निभाता है। नमक को संतुलित मात्रा में ही लें वरना ये दिमाग की कार्यशैली को काफी हद तक प्रभावित कर सकता  है। 

     छींक को रोकने से कान को पहुँचता है नुक्सान। 

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    ऐसे लोग जो अक्सर छींक आने पर इसे रोकने की कोशिश करते है। उनके कान को नुक्सान पहुँच सकता है
    ऐसा एक शोध में सामने आया है। बीएमजे केस रिपोर्ट जर्नल में प्रकाशित शोध के अनुसार छींक को रोकने की स्तिथि में गले और ईयर ड्रम को नुक्सान पहुँच सकता है इसके अलावा ये स्तिथि शरीर में कई तरह के कॉम्प्लीकेशंस को बढ़ा सकती है। इसके अलावा दिमाग में जाने और रक्तसंचार करने वाली धमनी भी क्षतिग्रस्त हो सकती है।

     धूम्रपान की आदत भगा सकता है टमाटर :-

    यदि आप धूम्रपान की बुरी आदत को छोड़कर स्वस्थ रहना चाहते है। तो रोजाना एक कटोरी टमाटर का जूस पीना फायदेमंद है। टमाटर में क्लोरोजेनिक और काओमेरिक एसिड होते है, जो सिगरेट के धुंए में पाए जाने वाले कारसीनोजेनस जैसे विषाक्त पदार्थ से शरीर को होने वाले नुक्सान को रोकने में मदद करते है। टमाटर को कच्चा खाने से भी बार-बार धूम्रपान करने की तलब नहीं उठती। 

     सनशाइन विटामिन को ना करें मिस :- 

    विटामिन डी जिसे सनशाइन विटामिन भी कहा जाता है। क्योंकि यह सूर्य के प्रकाश की प्रतिक्रिया से बनता है। विटामिन डी के दो प्रकार होते है, जिन्हें डी 2 और डी 3 के नाम से जाना जाता है। विटामिन डी वसा में घुलनशील विटामिन है अर्थात यह हमारी वसा कोशिकाओं में संचित रहता है। और लगातार कैल्शियम के चयापचय ( मेटाबॉलिज़्म ) और हड्डियों के निर्माण में प्रयोग होता रहता है। 

     Last words :-

    दोस्तों आपको Pet saaf Rakhne ke sabse achhe tarike  - ये आर्टिकल कैसा लगा 
    अपने Opinion हमारे साथ अवश्य शेयर करें। 
    हम मिलेगें आपसे फिर,  एक नए और फ्रेश आर्टिकल के साथ। 
     तब तक के लिए खुश रहिए, स्वस्थ रहिए। 
    धन्यवाद 

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